भोपाल। स्मरण हबीब इक्कीसवें रंग आलाप नाट्य महोत्सव की तीसरी शाम वरिष्ठ रंगकर्मी और फ़िल्म अभिनेता राजीव वर्मा के निर्देशन में भोपाल थियेटर्स द्वारा नाटक चौथी सिगरेट का मंचन किया गया। नाटक के केंद्र में दो मित्र हैं। एक नामचीन लेखक विरेश्वर है और दूसरा नामी उद्योगपति समरेन्दु सान्याल है। लेखन ही विरेश्वर का जीवनयापन का एक मात्र साधन है।विरेश्वर की दो शादी के योग्य बेटियां हैं।एक इंजीनियर बेरोजगार बेटा। आर्थिक तंगी ने विरेश्वर को तोड़ दिया है।
समरेन्दु के मन में विद्यार्थी जीवन से लेखक बनने का सपना रहा। एक दिन भटकते-भटकते समरेन्दु की मुलाकात विरेश्वर से बरसों बाद होती है। दोनों विद्यार्थी जीवन की यादों में खो जाते हैं। बातचीत में समरेन्दु को विरेश्वर की विपन्नता का पता चलता है। पैसों के अभाव से विरेश्वर की रचनाएं धूल चाट रही हैं। उन्हें वो छपवा नहीं सकता। समरेन्दु विरेश्वर की पांडुलिपियां खरीदने का प्रस्ताव रखता है, इस शर्त के साथ कि वो इन पांडुलिपियों को अपने नाम से छपवाएगा और रायल्टी की मिलनेवाली राशि विरेश्वर को देगा।
आकंठ गरीबी में डूबा हुआ लेखक विरेश्वर अपनी पांडुलिपियां समरेन्दु सन्याल को बेच देता है। समरेन्दु विरेश्वर की लिखी किताबों को अपने नाम प्रकाशित करवाता है। अचानक आई सम्पन्नता और खुशहाली के पीछे किए गए सौदे का जब परिवार के सदस्यों को पता चलता है तो सब उसका विरोध करते हैं। इस बीच उपन्यासों को लोकप्रियता मिलती है।यहां तक कि प्रतिष्ठित बुकर प्राइस भी मिल जाता है।
लेकिन समरेन्दु सन्याल की आत्मग्लानी उसका पीछा नहीं छोड़ती है। वो विरेश्वर से कहता है कि मैं दुनिया को बता देना चाहता हूं कि ये मेरे लिखे उपन्यास नहीं हैं इसका असली रचनाकार विरेश्वर है। विरेश्वर मना करता है कि वो ऐसा न करे। उसके दिए पैसों से ही जो समाज उसे नाकारा बाप समझता था अब सम्मान की दृष्टि से देखने लगा है।वो वापस उन गुरबत के दिनों में लौटना नहीं चाहता।
नाटक अपने चरमोत्कर्ष पर तब पहुंचता है जब विरेश्वर समरेन्दु से कहता है कि अगर उसने ये उजागर कर दिया कि असली लेखक कौन है तो ये लेखक और पाठकों के साथ धोखा होगा। तुम्हारे इस रहस्योदघाटन से अब तक का लिखा समूचा साहित्य कटघरे में खड़ा हो जाएगा। बेहतर यही होगा कि हमारे बीच जो सौदा हुआ था, वो जारी रहे। यही हम दोनों के हित में है।
योगेश त्रिपाठी लिखित और राजीव वर्मा निर्देशित ये नाटक समाज में लेखकों के कमजोर आर्थिक पहलू पर गंभीरता से सोचने को विवश कर देता है।
‘चौथी सिगरेट’..कथा सार
एक लेखक की इच्छा होती है कि उसका लिखा हुआ पढा जाये, लोग उस पर चर्चा करें, टीका टिप्पणी करें, नुक्ताचीनी करें, उसके विचारों को जानें. पाठक सहमत हों या न हों पर उन तक अपनी बात पहुँचाना ही उद्देश्य होता है. लेकिन लेखन को पाठक तक पहुँचने से पहले एक व्यवस्था यानि सिस्टम से गुज़रना होता है. ये एक ऐसी व्यवस्था है जिसके कारण कई बार श्रेष्ठ रचनाएं पाठक तक पहुंच ही नही पातीं या छद्म नामो से पहुँचती हैं. हमारा समाज लेखकों साहित्यकारों से अत्यधिक नैतिकता की अपेक्षा रखता है और साथ ही साथ वो पूंजीपतियों को एक तरह का खलनायक समझता है. दोनो ही धारणाओं पर अलग अलग दृष्टिकोण से सार्थक बहस और विमर्श की आवश्यकता को दर्शाता है नाटक …चौथी सिगरेट।










